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जो रंगो से मजहब बताते है।
वो तिरंगे पर सरहद बनाते है।।
वो तिरंगे पर सरहद बनाते है।।
हस्ता होगा ऊपरवाला भी
देखकर ये सब,
ये उसको भी,
तेरा मेरा अलग बताते है।।
देखकर ये सब,
ये उसको भी,
तेरा मेरा अलग बताते है।।
खीर तो मंदिरों में भी खाई है,
और मस्जिद मे भी,
जाने कैसे लोग फर्क बताते है
और मस्जिद मे भी,
जाने कैसे लोग फर्क बताते है
मर गए कुछ लोग कल भूख से,
हम वजय पूछते है ,
वो मजहब बताते है,
हम वजय पूछते है ,
वो मजहब बताते है,
मजहब बता कर भी कुछ लोग फर्क बताते है,
अल्लाह हो या भगवान,
ये लोग,
सबको को अलग बताते है।।
अल्लाह हो या भगवान,
ये लोग,
सबको को अलग बताते है।।
आज हम फकीर के लकीर बने खरे है,
हम से जादा तो ,
इस मैदान में हैवान खरे है।।
हम से जादा तो ,
इस मैदान में हैवान खरे है।।
कभी पुलवामा तो कभी दिल्ली में antr युद्ध ,
कब्र की दो गज जमीन नसीब कराने को,
क्या हमसे बड़े ये बुद्ध ??
कब्र की दो गज जमीन नसीब कराने को,
क्या हमसे बड़े ये बुद्ध ??
सीमा से जादा ती, हम घर में अपने वीर खो रहे है,
अपनी ही धरती पर तो,
दूसरो से जादा अपनों का ग़म पी रहे ।।
अपनी ही धरती पर तो,
दूसरो से जादा अपनों का ग़म पी रहे ।।
---Ankit kumar
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